नई पीढ़ी को संस्कारवान बनाने की गूँज: पाठ्यक्रम में ‘श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ’ को शामिल करने के लिए 150 आश्रमों ने बुलंद की आवाज़

मीरा, कबीर और गुरु नानक के सदृश स्वामी टेऊँराम की वाणी; संतों ने मुख्यमंत्री और राज्यपाल को पत्र लिखकर आध्यात्मिक विरासत सहेजने का किया आह्वान

जयपुर (सिन्धु गौरव न्यूज़)

आधुनिकता की दौड़ में नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और नैतिक मूल्यों से जोड़ने के लिए सिंधी समाज ने एक ऐतिहासिक अभियान का शंखनाद किया है। देश-विदेश में स्थित सिंधी समाज के 150 प्रेम प्रकाश आश्रमों ने आराध्य आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज द्वारा रचित ‘श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ’ की अमृतमयी वाणी को स्कूल और कॉलेजों के हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है।

शासन और प्रशासन तक पहुँची आध्यात्मिक विरासत सहेजने की मांग

जयपुर के एम.आई. रोड स्थित श्री अमरापुर स्थान के संतों ने इस मुहिम को सरकारी स्तर पर प्रभावी ढंग से रखा है। संत मोहन प्रकाश महाराज एवं स्वामी मनोहर लाल जी के नेतृत्व में राजस्थान के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, शिक्षा मंत्री और पाठ्य पुस्तक मण्डल को औपचारिक पत्र भेजकर इस आध्यात्मिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का आग्रह किया गया है।

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श्री प्रेम प्रकाश ग्रन्थ
‘डिब वाले साई’ की वाणी: वेदों और शास्त्रों का सार

सिंध के रेतीले टीलों पर दरबार बनाने के कारण ‘डिब वाले साई’ के नाम से विख्यात स्वामी टेऊँराम जी महाराज की वाणी में सामाजिक समरसता और विश्व बंधुत्व का संदेश समाहित है।

  • साहित्यिक तुलना: स्वामी जी की वाणी की सरलता मीरा, सूरदास, कबीर, रसखान और गुरु नानक देव जी के समकक्ष है।
  • ग्रंथ की विशेषता: 800 पृष्ठीय इस ग्रंथ में लगभग 1500 दोहे, 800 पद्य, 500 छंद, 300 कविता और 2000 भजनों का संग्रह है।
  • प्रमुख रचनाएँ: इसमें ‘दोहावली’, ‘ब्रह्मदर्शनी’, ’16 शिक्षाएं’, ‘सलोक माला’ और ‘शांति के दोहे’ जैसे कालजयी खंड शामिल हैं।
विभाजन के बाद जयपुर बना मुख्य केंद्र

विभाजन के बाद स्वामी सर्वानंद महाराज ने जयपुर में ‘श्री अमरापुर दरबार’ का निर्माण करवाया, जहाँ आज भी सिंध के टण्डेआदम और खंडू गाँव की पवित्र रज (मिट्टी) दर्शनार्थ सुरक्षित रखी गई है।

संतों ने कहा-युवाओं को मिलेगी नई दिशा

इस मांग को पुरजोर तरीके से उठाने वालों में संत मोनूराम जी (जयपुर), स्वामी राम प्रकाश जी (अजमेर), संत नवीन जी, संत श्याम लाल जी (कोटा), संत लक्ष्मण दास (अहमदाबाद), संत परसराम जी (जलगांव), संत भोलाराम जी (कानपुर), संत जीतूराम जी (जोधपुर), संत शंभू लाल जी (ब्यावर), संत गुरुदास (जयपुर), संत कमल (गांधीधाम), संत हिमांशु लाल (हरिद्वार) और संत शंकर लाल (मुम्बई) शामिल हैं।

समाज के गणमान्य जनों ने उठाई मांग

साथ ही समाज के गणमान्य नागरिक बी.डी. टेकवानी, राजकुमार संगतानी, गोवर्धन दास आसनानी, भरत आसनानी, कुमार विधानी, जितेंद्र दाधीच (शिक्षक), दिलीप पारवानी (सिंधु गौरव), वरुण टेकवानी और प्रदीप मालिक ने भी इस साहित्यिक धरोहर को पाठ्य पुस्तकों का हिस्सा बनाने की मांग की है। जयपुर, अजमेर, कोटा, जोधपुर सहित देश के विभिन्न शहरों जैसे मुंबई, अहमदाबाद, कानपुर और गांधीधाम के संतों ने भी इस मांग को पुरजोर तरीके से दोहराया है ताकि आध्यात्मिक चिंतन के जरिए भविष्य के नागरिक संस्कारवान बन सकें।

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